पहले बाघ का शिकार किया, फिर उनसे दोस्ती हुई और बाद में उन्हीं का संरक्षक बन गया मसीहा : Jim Corbett

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आज हम आपको एक ऐसे इंसान के बारे में बताने जा रहे है, जिन्हे हर आज याद करता है। यह भारत देश के तो नहीं थे लेकिन इनकी कहानी हिंदुस्तानीयो से ही जुडी हुई है। हम आपको बताने जा रहे है, Jim Corbett उर्फ कारपेट साहब। इनका बचपन जंगल की गोद में बीता और जवानी बाघों का शिकार करते हुए बीती, लेकिन यह बाद में उन्ही बाघों को बचाने के लिए जाने गए।

कौन थे जिम कॉर्बेट ?

भारत को आज़ाद हुए अभी कुछ समय ही हुआ था, यह एक सच्चा हिंदुस्तानी था, जिसकी पीढ़ी पहले आयरलैंड की खुबसूरती को छोड़ भारत आकर बस गयी थी। 25 जुलाई 1875 को यहीं भारत के नैनीताल में इस आयरिश (आम लोगों के लिए अंग्रेज) का जन्म हुआ। यह जंगलों में तीर कमान चलाते हुए अपना जीवन जीने लगे थे। बचपन बचपन का नाम इनका जेम्स एडवर्ड कॉर्बेट था बाद में यह जिम कॉर्बेट के नाम से जाने गए.

Jim Corbett, कारपेट साहेब कैसे बन गए?

जिम कॉर्बेट को स्थानीयों लोग कारपेट साहेब के नाम से भी बुलाते थे। कॉर्बेट जब मात्र 6 साल के थे, तब इनके सिर से पिता का साया उठ गया, इनका बचपन कालाढूंगी के जंगल में तीर और गुलेल से शिकार करने का अभ्यास करते हुए बिता। पढ़ाई इन्होंने नैनीताल से की लेकिन ज़्यादा पढ़े नहीं क्योंकि किताबों से सर मारना पसंद नहीं था। इन्होने कई बाघों का शिकार भी किया था। 18-19 साल की उम्र में बंगाल एंड नार्थ वेस्टर्न रेलवे में फ्यूल इंस्पेक्टर के तौर पर भर्ती हो गए।

ज़्यादातर लोगों के लिए कॉर्बेट एक शिकार और जंगल से जुड़े इंसान के रूप में जानते हैं लेकिन उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा रेलवे से भी जुड़ा हुआ है। वह 20 साल तक रेलवे से जुड़े रहे और इसी दौरान उनके अंदर हिंदुस्तान ने पूरी तरह से घर कर लिया था। जिम कॉर्बेट की 6 किताबों में से एक किताब है माय इंडिया. इस किताब में उनके रेलवे जीवन से जुड़े कई किस्से हैं। यह किताब बताती है कि कॉर्बेट हिंदुस्तान और यहां के लोगों से कितनी मोहब्बत करते थे।

कैसे शिकारी से बाघों के मसीहा बने कार्बेट?

जिम कॉर्बेट की हमेशा से एक आदत रही थी कि वह सिर्फ आदमखोरों का शिकार ही नहीं करते थे, बल्कि उनके शरीर और स्वभाव पर अध्ययन भी करते थे। एक समय उन्होंने एक आदमखोर बाघिन के शरीर को गौर से देखा तो पाया कि उसके चेहरे और शरीर पर गोली तथा अन्य हथियारों के निशान मौजूद हैं। इस अध्ययन के बाद कॉर्बेट ये जान पाए कि इस बाघिन के जबड़े पर गोली मारी गई थी।

कॉर्बेट ने ये बात समझी कि बेवजह ये जानवर आदमखोर नहीं बनते बल्कि जब इंसान इन पर हमला करता है, तभी वह इन पर हमला करते है। गहन अध्ययन के बाद कॉर्बेट नतीजे पर पहुंचे कि इंसानों को बाघ चीतों से बचाने से ज़्यादा जरूरी है। इसके बाद से ही कॉर्बेट बाघ और चीतों को बचाने के अभियान में जुट गए लोगो को इनका शिकार नहीं करने के लिए भी जागरूक किया।

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