ओलंपिक एथलीट अपने पदक जीतने के बाद अपने दांतों से क्यों काटते हैं?, पोज है या परंपरा…

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भले ही टोक्यो ओलंपिक 2020 समाप्त हो चुका है, लेकिन ओलंपिक खेलों से जुड़ी खबरें अभी भी आती रहती हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही रोचक परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं, जो ओलंपिक खिलाड़ियों की परंपरा, पोज बन गई है या यूं कहें कि उनका फोटोशूट कराने का पोज, परंपरा बन चुका है। आइए देखते हैं, यह पोज या परंपरा।

ओलंपिक खेल में जीत के बाद हर खिलाड़ी अपने मेडल के साथ फोटोशूट कराता है। लेकिन आपने गौर किया होगा कि वह अपने मेडल को अपने दांतो से काटते हुए फोटो शूट कराता है। आपको बता दें कि दातों से मेडल को काटने से सोने की शुद्धता का पता चलता है।

मेडल जीतने के बाद उसे दातों के काटने की परंपरा एथेंस ओलंपिक में शुरू की गई थी। लेकिन स्टॉकहोम ओलंपिक 1912 में इस परंपरा पर रोक लगा दी है। माना जाता है कि स्टॉकहोम ओलंपिक में ही खिलाड़ियों को आखरी बार शुद्ध सोने के मेडल दिए गए।

ओलंपिक खेलों के खिलाड़ियों को जो सोनी का मेडल दिया जाता है, उसने 496 ग्राम चांदी व सिर्फ 6 ग्राम सोना मिला होता है। इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ ओलंपिक हिस्‍टोरियन के अध्‍यक्ष डेविड का मानना है कि मेडल को दांत से काटना दरअसल खिलाडि़यों के पोज देने का तरीका है। इसके जरिये वे अपनी जीत की खुशी जाहिर करते हैं। धीरे-धीरे यही इसका मान्‍य तरीका बन गया है।

आपको बता दें कि सोने की शुद्धता की परख करने के लिए उसे दांतो से काटना एक सदियों से चली आ रही परंपरा है। दांतों से काटने पर सोने पर दांत के निशान पड़ जाते हैं, जो इस की शुद्धता का प्रमाण है।

इसके पोज या परंपरा के चलते खेल के मैदान पर कुछ रोचक नजारे भी देखने को मिले, साल 2010 में जर्मनी के एथलीट लुगर मोलर जीत के बाद अपने सिल्‍वर मेडल को दांतों से काट रहे थे, तभी उनका दांत निकलकर बाहर आ गया।

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