व्रत में लोगों का भोजन बनने वाला मखाना, जान जोखिम में डालकर किसान करते हैं उनकी पैदावार, किसानों के पैर घायल, और नाखून तक निकल जाती है…

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व्रत में मखाना खाना लोग खूब पसंद करते हैं। कमल के बीज से बनने वाला मखाना काफी पौष्टिक होता है। यह प्रोटीन से भरपूर होता है और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी काफी लाभदायक होता है क्या कभी आपने सोचा कि मखाना कैसे बनता होगा तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि गोल गोल दिखने वाला मखाना कैसे बनता है?

मखाना को उगाना और बनाना बड़ा कठिन होता है। इसमें जान का भी जोखिम होता है क्योंकि पानी के अंदर कांटो के बीच काफी देर तक रहकर इसे प्राप्त किया जाता है और एक लंबे प्रोसेस के बाद यह मखाना हमारे खाने जैसा बनता है।

पानी के अंदर से मखाने के बीज को निकाला जाता है और यह पानी कम से कम 4 से 5 फीट गहरा होने के साथ ही इस पानी के अंदर नुकीले कांटे वाले पौधों से, इसे तोड़ना पड़ता है। कीचड़ से भरे पानी से मखाना निकालने में कई बार पैरों के नाखून भी निकल जाते हैं और पैरों में काफी जख्म हो जाते हैं।

मखाने के बीज को निकालने के बाद उसकी गुर्री को लावा का रूप दिया जाता है। जिसे 40-45 डिग्री पर रखा जाता है, करीब 350 डिग्री पर इसे लावा बनाकर पकाने की प्रक्रिया लगभग 80 ँं तक चलती है।

इस गुर्री को ग्रैंडिंग 6 छनिंयों से की जाती है। कच्चा लोहा मिश्रित मिट्टी के छह बड़े पात्रों को चूल्हों पर रखा जाता है। दूसरी हीटिंग 72 घंटे बाद की जाती है। इस दौरान ऊपर परत एकदम चटक जाती है फिर उसे हाथ में लेकर हल्की चोट की जाती है तब नर्म मखाना निकलता है। यह प्रक्रिया काफी ज्यादा जटिल होती है, इसीलिए मखाने की खेती को सबसे मुश्किल खेती कहा जाता है।

उत्तरी बिहार में मखाने की सबसे बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। इसमें लगभग 6 लाख लोग जुड़े हुए हैं, लेकिन सबसे बड़ी कमी यह है कि अपनी जान को जोखिम में डालकर, अपने पैरों को घायल करके इस बीज को निकालने वाले मल्लाह को उनकी मेहनत का उचित दाम भी नहीं मिलता है, जबकि बाजार में मखाना हजारों रुपए तक बिक जाता है।

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